मधुबनी/खुटौना: आज के दौर की एक कड़वी सच्चाई यह है कि जब कोई छात्र मेडिकल की पढ़ाई करता है, तो उसका और उसके परिवार का पहला सपना होता है— किसी बड़े शहर में सेटल होना। बड़ी डिग्री हासिल करने के बाद लोग एसी केबिन, लग्जरी गाड़ियाँ और एक लग्जरियस लाइफस्टाइल (Luxurious Lifestyle) जीना चाहते हैं। शहरों की इस चकाचौंध और पैसा कमाने की अंधी दौड़ में गाँव का वह गरीब मरीज कहीं बहुत पीछे छूट जाता है, जो इलाज और सही डॉक्टर के अभाव में सिसक-सिसक कर दम तोड़ देता है। लेकिन मधुबनी जिले के खुटौना में एक ऐसे डॉक्टर हैं, जिन्होंने बड़े शहरों के इस लालच को ठोकर मार दी। एमडी मेडिसिन (MD Medicine) की उच्च डिग्री हासिल करने और दिल्ली-हैदराबाद में काम करने के बाद डॉ. अमित कुमार अपने दादाजी का सपना साकार करने अपनी माटी, अपने गाँव खुटौना लौट आए हैं।

1965 का वह दौर: जब भगवान बाबू नब्ज देखकर पकड़ लेते थे बीमारी
डॉ. अमित कुमार के इस त्याग के पीछे एक बेहद भावुक और गौरवशाली इतिहास छिपा है। बात 1965 के समय की है। उस जमाने में खुटौना और आस-पास दूर-दूर तक न कोई पक्की सड़क थी, न अस्पताल और न ही कोई डॉक्टर। उस घोर अभाव के बीच डॉ. अमित के दादाजी स्व. भगवान प्रसाद अग्रवाल (जिन्हें लोग प्यार से भगवान बाबू कहते थे) ने खुटौना में एक दवा दुकान की शुरुआत की थी।

पूरे इलाके में दूर-दूर तक वही एकमात्र दवा की दुकान थी। भगवान बाबू के पास भले ही आज जैसी मशीनें नहीं थीं, लेकिन उनका प्रैक्टिकल नॉलेज (व्यावहारिक ज्ञान) इतना जबरदस्त था कि वे मरीज की सिर्फ नब्ज देखकर ही बीमारी पकड़ लेते थे। मरीज की नब्ज टटोलकर भगवान बाबू ऐसी सटीक दवा देते थे कि रोता हुआ और दर्द से कराहता हुआ मरीज हंसता हुआ अपने घर जाता था। आज उन्हीं भगवान बाबू का सपना उनका पोता डॉ. अमित अग्रवाल साकार कर रहा है। दादा ने जो सेवा की नींव रखी थी, पोता भगवान प्रसाद अग्रवाल मेमोरियल क्लिनिक के जरिए उस पर आधुनिक चिकित्सा का महल खड़ा कर रहा है।
दरभंगा-पटना के बस भाड़े से भी कम खर्च में पूरा इलाज
एक गरीब ग्रामीण के लिए बीमारी से ज्यादा खौफनाक होता है इलाज का खर्च। दरभंगा, पटना या दिल्ली जाने के नाम से ही मरीज का आधा खून सूख जाता है। जाने-आने के लिए गाड़ी रिजर्व करने का भारी-भरकम भाड़ा, रहने-खाने का खर्च और ऊपर से बड़े अस्पतालों की मोटी फीस! क्लिनिक के बाहर बैठे मरीज खुद बताते हैं कि, “जितना रुपया हमें दरभंगा या पटना जाने के भाड़े में लग जाता है, उससे भी कम खर्च में डॉ. अमित अग्रवाल के पास हमारी पर्ची, जाँच और बेहतरीन दवा का पूरा इलाज हो जाता है।“
मरीजों की जुबानी: डॉक्टर साहब हमें मौत के मुँह से खींच लाए
यहाँ इलाज कराने वाले मरीजों की आँखों में डॉक्टर अमित के लिए भगवान जैसी श्रद्धा दिखती है। भूमि न्यूज़ लाइव की टीम ने जब मरीजों से बात की, तो उनकी कहानियाँ रोंगटे खड़े करने वाली थीं:

- मैं मौत के मुँह में जा रहा था: मो. मुदीन मंसूरी (MD. Muddin Mansuri) की कहानी आँखों में आंसू ला देती है। 2021 से डायबिटीज के शिकार मुदीन का शुगर लेवल 500 के पार चला गया था। उनके पैरों में सुन्नपन (झुनझुनी) आ गया था, शरीर में जान नहीं बची थी और आँखों की रोशनी खत्म होने लगी थी। कई जगह इलाज कराने के बाद वे डॉ. अमित के पास पहुँचे। मुदीन भावुक होकर कहते हैं, “मैं शुगर की वजह से मौत के मुँह में जा रहा था, लेकिन डॉक्टर साहब ने मेरी जिंदगी लौटा दी। एक महीने के अंदर मेरा शुगर 90 पर आ गया। वे मेरे लिए भगवान के समान हैं।“

- यहाँ डॉक्टरों वाली लूट-खसोट नहीं है: सिकटियाही से आई रामपरी देवी ने कैमरे के सामने बेबाकी से कहा कि बहुत सी जगहों पर डॉक्टर मरीजों को लूटते हैं, लेकिन डॉ. अमित अग्रवाल के यहाँ कोई लूट नहीं है। मात्र तीन बार यहाँ आने में ही उनकी पुरानी बीमारी में भारी सुधार हो गया।

- एक साल से भटक रहे थे: झंझारपुर से आए राम प्रकाश यादव बताते हैं कि वे अपनी बीपी और हार्ट की बीमारी को लेकर साल भर से परेशान थे। झंझारपुर में इलाज कराया पर दवा सूट नहीं की। जब से वे डॉ. अमित के पास आए हैं, उनका बीपी बिल्कुल कंट्रोल में है। राम प्रकाश जी को भगवान बाबू के वो पुराने दिन भी याद हैं, जब वे इस पूरे इलाके में मशहूर हुआ करते थे।

- पिपराही की ललिता देवी जैसी कई और महिलाएँ भी बड़े शहरों के डॉक्टरों की दवाइयाँ छोड़कर अब विश्वास के साथ खुटौना पहुँच रही हैं।
कलकत्ता से पढ़ाई कर चुके डॉ. अमित कुमार आज ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैल रही डायबिटीज (शुगर) और हाई बीपी जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए एक मजबूत ढाल बन गए हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि लग्जरी लाइफ जीने की चाहत में जिस गाँव को लोग पीछे छोड़ जाते हैं, असली सुकून और कामयाबी उसी गाँव की सेवा में है। 1965 में भगवान बाबू ने ग्रामीण मरीजों की नब्ज पकड़कर जो विश्वास कमाया था, आज डॉ. अमित अग्रवाल मरीजों का हाथ पकड़कर उस विश्वास को अमर कर रहे हैं।








