लौकहा (मधुबनी): पूरे 10 साल! यानी कि 3650 दिन! मधुबनी जिले के लौकहा बाजार और उसके अगल-बगल के गांवों की नाक के नीचे बेजुबान गायों और बछड़ों को बेरहमी से काटा जाता रहा, तड़पाया जाता रहा, लेकिन लौकहा का पूरा इलाका गूंगा, बहरा और अंधा बनकर सोया रहा। रविवार तड़के जब सशस्त्र सीमा बल (SSB) और स्थानीय पुलिस ने भारत-नेपाल सीमा से सटे लौकहा बाजार के परती टोल में ड्रोन उड़ाकर एक अवैध वधशाला का भंडाफोड़ किया, तो सिर्फ 80 किलो गोमांस ही बरामद नहीं हुआ, बल्कि इस सभ्य समाज की मरी हुई अंतरात्मा का वो घिनौना चेहरा भी सामने आ गया जिसे देखकर हर कोई हैरान है। इस बड़ी कार्रवाई में दो नाबालिगों समेत चार तस्कर (मुख्य आरोपी मो. राजाउल्ला और मो. हारून) दबोचे जरूर गए हैं, लेकिन आज असली सवाल पुलिस की इस कार्रवाई से बाद में, पहले इस समाज की खामोशी से पूछा जा रहा है।
क्या आंखों पर पट्टी बंधी थी या यह खूनी खेल अच्छा लग रहा था?
गिरफ्तार तस्करों ने पुलिस के सामने सीना तानकर कबूल किया है कि वे पिछले एक दशक से बिना किसी खौफ के इस अवैध धंधे को अंजाम दे रहे थे। वे लौकहा बाजार सहित आसपास के तमाम गांवों में ऑर्डर के आधार पर गोमांस की बड़ी खेप पहुंचाते थे। अब सबसे बड़ा और आक्रामक सवाल यही खड़ा होता है कि क्या लौकहा बाजार के लोगों की आंखों पर पट्टी बंधी थी? क्या अगल-बगल के गांवों के लोगों को अपने पड़ोस में बहने वाले बेजुबानों के खून से कोई ऐतराज नहीं था, या फिर अंदर ही अंदर इस अवैध काले कारोबार को पूरे इलाके का मौन समर्थन हासिल था? आखिर क्यों पूरे 10 साल में एक भी इंसान, एक भी स्वयंभू समाजसेवक या किसी भी जागरूक नागरिक को प्रशासन को सूचित करना मुनासिब नहीं लगा? क्या चंद रुपयों के लालच में या तस्करों के खौफ के आगे पूरे समाज ने अपनी जुबान बेच खाई थी?
खुशियों की शहनाई के पीछे बेजुबानों की चीखें!
इस पूरे मामले में संवेदनहीनता की हद तो तब पार हो गई, जब यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि रविवार तड़के जो 80 किलो मांस काटा गया था, वो किसी स्थानीय शादी समारोह की दावत में परोसा जाना था। सोचिए, एक तरफ किसी के घर खुशियों की शहनाई बजने वाली थी, और दूसरी तरफ किसी बेजुबान गाय का गला रेतकर उसकी कटी हुई लाश से मेहमानों की खातिरदारी करने की तैयारी थी। धिक्कार है ऐसी मानसिकता पर और धिक्कार है उस समाज पर जो इस घिनौने और रूह कंपा देने वाले सच को जानने के बाद भी हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा।
10 साल तक क्या सो रहा था स्थानीय खुफिया तंत्र?
10 साल तक क्या सो रहा था स्थानीय खुफिया तंत्र?इस महापाप में जितनी दोषी समाज की चुप्पी है, उतना ही बड़ा सवालिया निशान हमारे सिस्टम और पुलिस प्रशासन के पिछले रिकॉर्ड पर भी खड़ा होता है। यह सच है कि इस संयुक्त कार्रवाई को अंजाम देने वाले एसएसबी 18वीं वाहिनी के उप कमांडेंट अजीत सिंह, सहायक कमांडेंट बिकास राय और स्थानीय पुलिस के तमाम पदाधिकारी अभी इस इलाके में बिल्कुल नए हैं। इतने बड़े खतरनाक और घिनौने रैकेट को उजागर कर इसका मटियामेट करने के लिए आज जागरूक समाज के लोग इन वर्तमान जांबाज अधिकारियों को दिल से धन्यवाद दे रहे हैं और इनके हौसले को सलाम कर रहे हैं।
लेकिन इसके साथ ही जनता यह पूछने का भी पूरा हक रखती है कि इनसे पहले पिछले 10 सालों में यहाँ जो कई अधिकारी आए और गए, आखिर उन्हें कुछ पता क्यों नहीं चल पाया? अंतरराष्ट्रीय सीमा जैसे महा-संवेदनशील इलाके में एक अंतरराष्ट्रीय पशु तस्करी और गौकशी का रैकेट एक दशक तक फलता-फूलता रहा, कई थानों के बड़े-बड़े साहब आए, अपनी ड्यूटी काटकर चले गए, पर किसी को भनक तक क्यों नहीं लगी? जो सच इस नई टीम ने आते ही ड्रोन उड़ाकर बेनकाब कर दिया, वो पिछले 10 साल के साहबों को क्यों नहीं दिखा? क्या इससे पहले बॉर्डर पर मुस्तैद रहने वाली एजेंसियों और पूर्व के अधिकारियों को कभी यह जरूरी नहीं लगा कि इस संवेदनशील परती टोल की सघन सुध ली जाए? आखिर सिस्टम को जगाने के लिए हमेशा ऐसे ही किसी बड़े सीक्रेट ऑपरेशन का इंतजार क्यों करना पड़ता है?
कब तक सोते रहोगे, लौकहा के लोगों?
लौकहा थाना अध्यक्ष धीरज कुमार के मुताबिक, एसएसबी ने जब्त पशुओं (10 गाय और 4 बछड़े) और मांस की जब्ती सूची तैयार कर पुलिस को सौंप दी है, और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। यह पूरी कार्रवाई मधुबनी के वरीय पुलिस अधीक्षक योगेंद्र कुमार और एसएसबी 18वीं वाहिनी राजनगर के कमांडेंट के.आर. लोमरोड़ के सख्त निर्देशों पर हुई है। लेकिन कानून अपना काम करे, उससे पहले समाज को जवाब देना होगा। लौकहा में मो. राजाउल्ला और मो. हारून जैसे मोहरे तो आज सलाखों के पीछे चले गए, लेकिन उस सोच का क्या, जो इस जुर्म को 10 साल तक छुपाए रखी? अगर आज भी सीमावर्ती इलाकों के लोग नहीं जागे और अपने आसपास होने वाले इन काले कारनामों के खिलाफ मुंह नहीं खोला, तो इस महापाप का दाग कभी नहीं धुलेगा। जवाब दीजिए, लौकहा के लोगों—आखिर कब तक सोते रहोगे?









