पटना: साल 2005 का नवंबर महीना बिहार के इतिहास में एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट था। 15 साल के शासन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ था और नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए (JDU-BJP) की सरकार बनी थी। उस समय नीतीश कुमार के सामने जो बिहार था, वह बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) के मामले में पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था। शाम ढलते ही पूरा राज्य अंधेरे के आगोश में समा जाता था और सड़कों के नाम पर सिर्फ जानलेवा गड्ढे बचे थे।
ऐसे दौर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य को संकट से उबारने के लिए अपनी कैबिनेट के दो सबसे भरोसेमंद और कद्दावर चेहरों पर दांव लगाया। ये दोनों चेहरे थे— बिजेंद्र प्रसाद यादव (जदूय) और नंद किशोर यादव (भाजपा)। आज जब हम आधुनिक बिहार को देखते हैं, तो इसकी मजबूत नींव में इन दोनों यादव मंत्रियों के काम की गूंज साफ सुनाई देती है। इन दोनों नेताओं ने अपने-अपने विभागों में ऐसा काम किया, जिसने बिहार की तस्वीर और तकदीर दोनों को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।

बिजेंद्र प्रसाद यादव: बिहार को अंधेरे से उजाले में लाने वाले सारथी
2005 में जब बिजेंद्र प्रसाद यादव ने ऊर्जा मंत्रालय (Energy Department) का कार्यभार संभाला, तब बिहार में बिजली की उपलब्धता न के बराबर थी। लोग हफ्तों तक बिजली आने का इंतजार करते थे और लालटेन ही जीवन का एकमात्र सहारा थी। बिजेंद्र यादव ने एक कड़े प्रशासक के रूप में काम शुरू किया। उन्होंने न केवल राज्य के जर्जर बिजली सब-स्टेशनों और ग्रिडों को सुधारा, बल्कि नए पावर प्लांट लगवाने और केंद्रीय कोटे से बिहार की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया।

उनका सबसे बड़ा ऐतिहासिक कदम था— हर घर बिजली योजना। उन्होंने कसम खाई थी कि बिहार के आखिरी गांव के आखिरी घर तक बिजली पहुंचाएंगे। नतीजा यह हुआ कि बिहार देखते ही देखते लालटेन युग को पीछे छोड़कर एलईडी युग में प्रवेश कर गया। आज बिहार के गांवों में भी 20 से 22 घंटे बिजली रहती है, जिसका पूरा श्रेय बिजेंद्र प्रसाद यादव की दूरदर्शी नीतियों को जाता है।

नंद किशोर यादव: जिन्होंने गड्ढों के ऊपर बिछाया सड़कों और पुलों का जाल
दूसरी तरफ, बिहार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कनेक्टिविटी की थी। पटना से भागलपुर, पूर्णिया या मधुबनी जाने में लोगों को 12 से 14 घंटे लग जाते थे। इस चुनौती को स्वीकार किया तत्कालीन सड़क निर्माण मंत्री नंद किशोर यादव ने। नंद किशोर यादव ने पद संभालते ही राज्य में सड़कों के चौड़ीकरण और पुलों के निर्माण का एक महा-अभियान शुरू किया।
उन्होंने मुख्यमंत्री सेतु निर्माण योजना को इतनी तेजी से धरातल पर उतारा कि बिहार का सुदूर से सुदूर गांव भी मुख्य सड़क से जुड़ गया। उन्होंने बिहार को एक नया लक्ष्य दिया— बिहार के किसी भी कोने से चलकर सिर्फ 5 से 6 घंटे में राजधानी पटना पहुंचा जा सके। नंद किशोर यादव ने केवल सड़कें ही नहीं बनाईं, बल्कि अपने अगले कार्यकालों (स्वास्थ्य मंत्री और दोबारा पथ निर्माण मंत्री) में पटना में कई महत्वपूर्ण फ्लाईओवर और गंगा नदी पर मेगा ब्रिजों को मंजूरी देकर राज्य की रफ्तार बढ़ा दी। वर्तमान में वे नागालैंड के राज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

विकास का वो पोस्टर बॉय जिसके दम पर एनडीए जीतता रहा चुनाव
नीतीश कुमार और एनडीए गठबंधन ने 2010, 2015 और उसके बाद के जितने भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव लड़े, उन सब में विकास का सबसे बड़ा ढिंढोरा इसी सड़क और बिजली के नाम पर पीटा गया। एनडीए के नेता मंचों से छाती ठोककर कहते थे कि हमने बिहार को सड़क और बिजली दी है। जनता ने भी इस काम को सराहा और हर चुनाव में एनडीए की झोली वोटों से भर दी। यानी, इन दो यादव मंत्रियों के काम की बदौलत ही एनडीए बिहार की सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रख सका।
बड़ा सवाल: तकदीर बदलने वाले यादव आज हाशिए पर क्यों?
लेकिन इस पूरी कहानी का एक कड़वा और सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू यह है कि जिन दो मंत्रियों ने एनडीए सरकार की लाज बचाई और बिहार का कायाकल्प किया, आज उसी एनडीए गठबंधन के भीतर यादव समाज खुद को राजनीतिक रूप से हाशिए पर महसूस करता है। इसके पीछे बिहार का जटिल जातीय और राजनीतिक समीकरण है।
राजनीति अपनी जगह चलती रहेगी और समीकरण बदलते रहेंगे, लेकिन बिहार के विकास का इतिहास जब भी निष्पक्षता से लिखा जाएगा, तो यह दर्ज रहेगा कि राज्य को पिछड़ेपन के दलदल से निकालने वाले दो सबसे बड़े शिल्पकार यादव ही थे। बिजेंद्र प्रसाद यादव और नंद किशोर यादव ने यह साबित किया कि अगर सही नीयत और कड़ा संकल्प हो, तो संसाधनों की कमी के बावजूद एक पूरे राज्य की किस्मत को बदला जा सकता है।







