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लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर दलेलचक-बघौरा नरसंहार को लेकर सोशल मीडिया पर फेक न्यूज वायरल, जानिए क्या है 1987 का ऐतिहासिक सच

लालू यादव के जन्मदिन पर दलेलचक-बघौरा नरसंहार को उनके राज की घटना बताने वाला सोशल मीडिया दावा ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह...

Aftermath of the 1987 Dalelchak-Baghaura massacre in Bihar, India. A local woman holds news archives. In the foreground, an old newspaper headline reads "दलेलचक-बघौरा नरसंहार"
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HIGHLIGHTS

  • भ्रामक नैरेटिव: आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर सोशल मीडिया पर 1987 के दलेलचक-बघौरा नरसंहार को लेकर भ्रामक पोस्ट वायरल।
  • ऐतिहासिक सच: यह जघन्य नरसंहार 29 मई 1987 को हुआ था, जबकि लालू यादव इसके करीब तीन साल बाद 10 मार्च 1990 को पहली बार मुख्यमंत्री बने।
  • कांग्रेस का शासन: घटना के समय बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और बिंदेश्वरी दुबे सूबे के मुख्यमंत्री थे।
  • राजनीतिक असर: इस नरसंहार के चौतरफा दबाव के बाद फरवरी 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे को इस्तीफा देना पड़ा था।
  • ध्रुवीकरण का दौर: 1987 की इस घटना ने बिहार में कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को हिलाकर लालू यादव के राजनीतिक उदय की जमीन तैयार की थी।

पटना: बिहार की राजनीति के शीर्ष पुरुष और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन के अवसर पर सोशल मीडिया का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। इंटरनेट पर एक तरफ जहां उनके समर्थक और शुभचिंतक बधाई संदेशों की बाढ़ ला रहे थे, वहीं दूसरी तरफ विरोधी खेमे और कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स द्वारा एक बेहद गंभीर और भ्रामक नैरेटिव को हवा दी जा रही है। पिछले कुछ घंटों से फेसबुक पर बिहार के इतिहास के सबसे क्रूर और दर्दनाक अध्यायों में से एक— दलेलचक-बघौरा नरसंहार को लालू यादव के शासनकाल से जोड़कर ट्रेंड कराया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इन पोस्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि इस जघन्य हत्याकांड के वक्त बिहार की कमान लालू प्रसाद यादव के हाथों में थी और इसे उनके दौर के जंगलराज की शुरुआत के रूप में पेश किया जा रहा है। डिजिटल दुनिया में तेजी से फैल रहे इस नैरेटिव को केंद्र बिंदु बनाकर इंटरनेट पर दावों, आरोपों और पलटवार का दौर जारी है। लेकिन जब हम राजनीति के शोर से दूर हटकर इतिहास के आधिकारिक दस्तावेज़ों और तारीखों को खंगालते हैं, तो सोशल मीडिया के ये तमाम दावे पूरी तरह से खोखले, भ्रामक और ऐतिहासिक तथ्यों से परे साबित होते हैं।

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दलेलचक-बघौरा नरसंहार 1987: सोशल मीडिया पर क्या हो रहा है वायरल?

लालू यादव के जन्मदिन के मौके पर कई यूज़र्स ने औरंगाबाद जिले के दलेलचक और बघौरा गांवों की पुरानी तस्वीरें, अखबारों की कतरनें और पीड़ितों की कहानियां साझा करना शुरू कर दिया। इन पोस्ट्स के कैप्शन में सीधे तौर पर लालू यादव की तत्कालीन सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। वायरल संदेशों में लिखा जा रहा है, लालू यादव के राज में हुआ था दलेलचक-बघौरा नरसंहार, जिसमें 54 बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया गया था, आज जन्मदिन पर इसे भी याद रखिए। बिना किसी फैक्ट-चेक के इस तरह की पोस्ट्स को हजारों बार शेयर किया जा चुका है, जिससे युवा पीढ़ी के बीच इतिहास को लेकर एक गलत धारणा बन रही है।

क्या है दलेलचक-बघौरा नरसंहार का असली इतिहास?

दलेलचक-बघौरा नरसंहार कोई ऐसी घटना नहीं है जिसका इतिहास दर्ज न हो। यह बिहार की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को बदलने वाली एक ऐतिहासिक त्रासदी थी।

यह जघन्य नरसंहार 29 मई 1987 की खौफनाक रात को औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड के दलेलचक और बघौरा गांवों में हुआ था। उस रात प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) के सैकड़ों हथियारबंद हमलावरों ने दोनों गांवों को चारों तरफ से घेर लिया था। हमलावरों ने जातिगत विद्वेष और प्रतिशोध की आग में अंधा होकर एक खास जाति (मुख्य रूप से राजपूत) के 54 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। मृतकों में बूढ़े, महिलाएं और मासूम बच्चे भी शामिल थे। यह घटना भूमि विवाद, बटाईदारी और इलाके में वर्चस्व की लड़ाई का चरम बिंदु थी, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।

तब मुख्यमंत्री कौन थे? तथ्यों का आईना

सोशल मीडिया पर वायरल दावों की हवा तब पूरी तरह निकल जाती है जब हम 1987 के बिहार के राजनीतिक नक्शे को देखते हैं:

  • कांग्रेस का शासनकाल: मई 1987 में बिहार में पूर्ण बहुमत की कांग्रेस पार्टी की सरकार चल रही थी।
  • बिंदेश्वरी दुबे थे मुख्यमंत्री: दलेलचक-बघौरा नरसंहार के समय बिहार के मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे थे। इस घटना के बाद कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उनकी सरकार की देशव्यापी आलोचना हुई थी। यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी स्थिति का जायजा लेने के लिए बिहार का दौरा करना पड़ा था।
  • मुख्यमंत्री का इस्तीफा: इस नरसंहार से उपजे भारी राजनीतिक दबाव और जनता के आक्रोश के कारण आखिरकार फरवरी 1988 में बिंदेश्वरी दुबे को अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था, जिसके बाद भागवत झा आजाद को बिहार की कमान सौंपी गई थी।
  • लालू यादव कब सत्ता में आए?: इतिहास गवाह है कि लालू प्रसाद यादव इस घटना के करीब तीन साल बाद, 10 मार्च 1990 को पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। 1987 में जब यह नरसंहार हुआ, तब लालू यादव विपक्ष के एक नेता मात्र थे, सत्ता के शीर्ष पर नहीं।

दलेलचक-बघौरा नरसंहार 1987: आखिर क्यों बार-बार लालू यादव से जोड़ा जाता है यह नरसंहार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर घटना कांग्रेस के राज में हुई, तो सोशल मीडिया पर इसका ठीकरा लालू यादव पर क्यों फोड़ा जाता है? इसके पीछे बिहार की राजनीति का एक गहरा बदलाव छिपा है।

दरअसल, दलेलचक-बघौरा नरसंहार ने बिहार के पारंपरिक सामाजिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया था। इस घटना के बाद कांग्रेस का जो पारंपरिक सवर्ण-पिछड़ा-दलित वोट बैंक था, वह पूरी तरह बिखर गया। सवर्ण समाज कांग्रेस से दूर हो गया और पिछड़ा वर्ग अपने नए राजनीतिक नेतृत्व की तलाश करने लगा। इसी दौर में मंडल कमीशन की लहर और कांग्रेस विरोधी आंदोलन ने लालू प्रसाद यादव को सूबे में पिछड़ों और वंचितों के सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया।

चूंकि 1990 के दशक में लालू यादव के कार्यकाल के दौरान भी बिहार ने लक्ष्मणपुर बाथे, शंकरबिगहा और बथानी टोला जैसे कई खूनी और भयानक जातीय नरसंहार देखे, इसलिए आज की डिजिटल पीढ़ी या राजनीतिक विरोधी अनजाने में या जानबूझकर एजेंडे के तहत 1987 की इस घटना को भी उसी कालखंड (90 के दशक) का हिस्सा मान लेते हैं।

लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन के मौके पर सोशल मीडिया पर दलेलचक-बघौरा नरसंहार की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेकने की कोशिश साफ दिखाई दे रही है। किसी भी राजनेता की नीतियों या उनके कार्यकाल की आलोचना करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इसके लिए इतिहास के तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना पत्रकारिता और सामाजिक जिम्मेदारी के सिद्धांतों के खिलाफ है। ऐतिहासिक सच यही रहेगा कि दलेलचक-बघौरा का दाग कांग्रेस की बिंदेश्वरी दुबे सरकार के माथे पर था, न कि लालू यादव के शासनकाल पर। इंटरनेट पर वायरल हो रहे दावे पूरी तरह से भ्रामक और ऐतिहासिक रूप से असत्य हैं।

Kartik Kumar

कार्तिक कुमार एक पत्रकार और लेखक हैं। उन्होंने कृषि विज्ञान में पढ़ाई और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। वे लोकप्रिय न्यूज़ पोर्टल भूमि न्यूज़ लाइव के संस्थापक हैं। ​कार्तिक की राजनीतिक समझ बहुत मजबूत है। वे गांव की पंचायत से लेकर देश की लोकसभा तक की ख़बरें लिखते हैं। साथ ही, उन्हें नेताओं की जीवनी (बायोग्राफी) लिखने का भी बड़ा हुनर है।

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