क्राइम ब्यूरो: राजस्थान के दौसा जिला पुलिस ने जाली भारतीय मुद्रा (फेक इंडियन करेंसी) के एक बड़े और बेहद शातिर नेटवर्क के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाई को अंजाम दिया है। पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर जिले के एक रिहायशी इलाके में चल रही अवैध नकली नोट छापने की मिनी फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया है। इस पूरी कार्रवाई के दौरान पुलिस ने मौके से भारी मात्रा में 500-500 रुपये के छपे हुए और अर्ध-निर्मित नकली नोट, अत्याधुनिक उपकरण, कटर और कच्चा माल जब्त किया है। इसके साथ ही रैकेट को संचालित करने वाले मुख्य मास्टरमाइंड सहित गिरोह के सक्रिय सदस्यों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया है।
पुलिस अधीक्षक कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस को पिछले कुछ दिनों से जिला मुख्यालय और आसपास के ग्रामीण इलाकों, विशेषकर साप्ताहिक हाट-बाजारों और छोटे किराना स्टोरों से जाली नोटों के चलन में आने की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए जिला पुलिस ने स्पेशल टास्क टीम और साइबर सेल के संयुक्त तत्वावधान में एक विशेष टीम का गठन किया। इस टीम ने संदिग्धों पर कड़ी निगरानी रखनी शुरू की। जांच के दौरान मुखबिर तंत्र से एक पुख्ता सूचना मिली कि शहर के एक सुनसान इलाके में स्थित मकान के भीतर कुछ लोग संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त हैं और वहां रात के समय मशीनों के चलने की आवाजें आती हैं।
इस सटीक सूचना पर पुलिस टीम ने योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया और संदिग्ध ठिकाने पर अचानक दबिश दी। जब पुलिस टीम मकान के भीतर दाखिल हुई, तो वहां का नजारा देखकर खुद पुलिस अधिकारी भी दंग रह गए। कमरे के भीतर बाकायदा एक मिनी प्रिंटिंग प्रेस सेटअप स्थापित किया गया था। वहां रखे हाई-एंड कलर लेजर प्रिंटर और अत्याधुनिक स्कैनर के जरिए हुबहू असली दिखने वाले 500 रुपये के नोट छापे जा रहे थे। पुलिस ने मौके से भारी मात्रा में तैयार किए जा चुके नकली नोट और बड़ी संख्या में ऐसे नोटों के पन्ने बरामद किए, जिनकी कटिंग होना बाकी थी। इसके अलावा नोटों के बीच में लगाई जाने वाली हरी और चमकीली सुरक्षा पट्टी (सिक्योरिटी थ्रेड) का डुप्लीकेट रोल भी बरामद किया गया, जिसका इस्तेमाल ये अपराधियों को चकमा देने के लिए करते थे।

पुलिस की पूछताछ में इस गिरोह के काम करने के बेहद चौंकाने वाले तौर-तरीकों (मोडस ऑपेरंडी) का खुलासा हुआ है। पूछताछ में सामने आया कि यह गैंग सीधे तौर पर बड़े व्यापारियों या बैंकों को निशाना नहीं बनाता था, क्योंकि वहां पकड़े जाने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इसके बजाय, इनका मुख्य टारगेट ग्रामीण अंचल के अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे दुकानदार, चाय के ठेले वाले, सब्जी विक्रेता और पेट्रोल पंप होते थे। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ये शातिर अपराधी नोटों को खपाने के लिए छोटे बच्चों को ‘बोगस ग्राहक’ बनाकर इस्तेमाल करते थे। वे इन बच्चों को ₹500 का नकली नोट देकर छोटी-मोटी चीजें जैसे बिस्कुट या सिगरेट खरीदने भेजते थे, ताकि बदले में उन्हें ₹450 से अधिक की असली नकदी (चेंज) वापस मिल सके।
पकड़े गए आरोपियों से की गई शुरुआती कड़ाई से पूछताछ में यह भी साफ हो गया है कि यह कोई स्थानीय छोटा गिरोह नहीं है, बल्कि इसके तार एक बड़े अंतरराज्यीय सिंडिकेट से जुड़े हुए हैं। यह गैंग अन्य राज्यों के अपराधियों से भी संपर्क में था, जहां असली नोटों के बदले भारी डिस्काउंट पर नकली नोटों की सप्लाई की जाती थी। गिरोह का सौदा कुछ इस तरह होता था कि वे ₹15,000 या ₹20,000 की असली भारतीय मुद्रा के बदले सामने वाले को ₹50,000 मूल्य के नकली नोट थमा देते थे। इस प्रकार यह नेटवर्क बहुत ही कम समय में अकूत संपत्ति कमाने और देश की अर्थव्यवस्था को अंदर से खोखला करने की बड़ी साजिश में लिप्त था।








